पुणे न्यूज डेस्क: पुणे के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) ने एक सड़क हादसे में मुआवजे के लिए मोटरसाइकिल को "प्लांट" (साजिशन शामिल करना) करने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। न्यायाधिकरण ने न केवल मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया, बल्कि पुणे जिला पुलिस अधीक्षक (SP) को उन पुलिसकर्मियों और वाहन मालिक के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है, जो इस धोखाधड़ी में शामिल थे।
न्यायाधिकरण के सदस्य हनुमंत एम. भोसले ने 17 अप्रैल को दिए अपने आदेश में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फर्जी दावों पर जताई गई चिंताओं का हवाला दिया।
मामले की मुख्य बातें:
दावा: यह याचिका 45 वर्षीय व्यक्ति की विधवा द्वारा दायर की गई थी, जिसकी 16 नवंबर 2020 को खेड़ पुलिस क्षेत्र के वाडा गांव में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसके पति को एक तेज रफ्तार मोटरसाइकिल ने टक्कर मारी थी।
बीमा कंपनी का तर्क: बीमा कंपनी ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला अज्ञात वाहन द्वारा 'हिट-एंड-रन' (टक्कर मारकर भागना) का था और बाद में बीमा राशि ऐंठने के लिए किसी और मोटरसाइकिल को फर्जी तरीके से इस मामले में शामिल किया गया।
न्यायाधिकरण का निष्कर्ष: ट्रिब्यूनल ने पाया कि दुर्घटना रात के समय हुई थी और मृतक को पीछे से टक्कर लगी थी, जिससे वाहन का नंबर पहचानना लगभग असंभव था। इसके अलावा, पुलिस रिकॉर्ड में पहले किसी और वाहन का नंबर दर्ज था, जिसे बाद में बिना किसी ठोस स्पष्टीकरण के बदल दिया गया।
पुलिस की भूमिका पर सवाल:
न्यायाधिकरण ने गौर किया कि इस मामले में FIR दुर्घटना के लगभग 25 दिन बाद दर्ज की गई थी, जिसकी कोई पर्याप्त वजह नहीं दी गई। अदालत ने इसे एक सोची-समझी साजिश (Afterthought) करार देते हुए कहा कि रिकॉर्ड में हेरफेर करके मोटरसाइकिल को "प्लांट" किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला:
अपने आदेश में न्यायाधिकरण ने सर्वोच्च न्यायालय के 'सफिया अहमद बनाम आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड' मामले का जिक्र किया। इसमें शीर्ष अदालत ने मोटर दुर्घटनाओं में फर्जी दावों की बढ़ती प्रवृत्ति पर संज्ञान लिया था और राज्यों को ऐसी धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त निर्देश दिए थे।
इस फैसले ने एक बार फिर बीमा धोखाधड़ी में पुलिस और वाहन मालिकों की मिलीभगत की ओर इशारा किया है, जिसके खिलाफ अब पुणे पुलिस अधीक्षक को विभागीय या कानूनी जांच करनी होगी।