पुणे न्यूज डेस्क: पुणे शहर और जिले में एक साल से भी कम समय के भीतर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से जुड़े तीन अलग-अलग आपराधिक मामलों ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन मामलों ने न केवल विभाग के भीतर अनुशासन और निगरानी व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है, बल्कि यह भी सवाल उठाया है कि क्या मौजूदा आंतरिक जांच और निगरानी तंत्र समय रहते ऐसे मामलों को रोकने के लिए पर्याप्त हैं। अलग-अलग मामलों में पुलिसकर्मियों पर लूट, जबरन वसूली और अपहरण जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।
ताजा मामला पिछले सप्ताह सामने आया, जब राजगढ़ पुलिस थाने में तैनात दो पुलिसकर्मियों का नाम उन 10 आरोपियों में शामिल हुआ, जिन्होंने कथित तौर पर एक कारोबारी से ₹1 करोड़ लूटने की कोशिश की। कारोबारी यह रकम नरहे स्थित एक निजी बैंक में जमा कराने जा रहा था। इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि दोनों पुलिसकर्मियों समेत छह आरोपी अब भी फरार हैं। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि क्या किसी पुलिसकर्मी को पहले से नकदी ले जाए जाने की जानकारी थी और शिकायत मिलने के बाद तय प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं।
पुणे ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक संदीप सिंह गिल ने बताया कि एफआईआर दर्ज होते ही दोनों पुलिसकर्मियों को तत्काल निलंबित कर दिया गया। उन्होंने पूरे मामले की विस्तृत विभागीय जांच के आदेश भी दिए हैं और रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
इससे पहले इसी महीने मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर महाराष्ट्र हाईवे सेफ्टी पेट्रोल के तीन पुलिसकर्मियों और तीन ट्रैफिक वार्डनों पर पर्यटकों का कथित अपहरण कर उनसे ₹5 लाख की वसूली करने की कोशिश का मामला दर्ज हुआ था। आरोप है कि दस्तावेज जांच के बहाने वाहनों को रोककर पैसों की मांग की गई। इस मामले में भी आपराधिक केस के साथ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई।
पिछले वर्ष कोंढवा में भी एक पुलिस कांस्टेबल पर चेन्नई के एक आईटी पेशेवर को फर्जी मादक पदार्थ मामले में फंसाने की धमकी देकर ₹28,000 वसूलने का आरोप लगा था। शिकायत के बाद रकम वापस कर दी गई थी, लेकिन पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया।
पूर्व महाराष्ट्र पुलिस महानिदेशक प्रवीण दीक्षित का कहना है कि अलग-अलग घटनाएं किसी भी पुलिस बल में हो सकती हैं, लेकिन कम समय में बार-बार ऐसे मामले सामने आना गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है। उनके अनुसार, पुलिस की विश्वसनीयता केवल अपराध सुलझाने से नहीं, बल्कि अपने ही विभाग में ईमानदारी और जवाबदेही बनाए रखने से भी तय होती है।
उन्होंने कहा कि केवल आपराधिक मुकदमा दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। विभागीय जांच भी समानांतर और तय समय सीमा में पूरी होनी चाहिए ताकि जवाबदेही स्पष्ट दिखे। उन्होंने बॉडी-वॉर्न कैमरे, डैशकैम और ड्रोन जैसी तकनीक के व्यापक इस्तेमाल की भी वकालत की। साथ ही 'पुलिस मित्र' जैसी सामुदायिक पुलिसिंग व्यवस्था को फिर से मजबूत करने का सुझाव दिया, ताकि पुलिस और जनता के बीच पारदर्शिता बढ़ सके।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि विभाग पुलिसकर्मियों की किसी भी तरह की गड़बड़ी को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाता है। उनका दावा है कि हाल के सभी मामलों में बिना किसी सार्वजनिक दबाव का इंतजार किए एफआईआर दर्ज की गई और विभागीय कार्रवाई भी शुरू की गई। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल घटना के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नियमित ईमानदारी ऑडिट, तकनीकी निगरानी, हाईवे पेट्रोल और पुलिस थानों की बेहतर मॉनिटरिंग तथा समयबद्ध विभागीय जांच जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करना जरूरी है।