पुणे न्यूज डेस्क: मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे का बहुप्रतीक्षित 'मिसिंग लिंक' सेक्शन शुरू होने के कुछ ही सप्ताह बाद अपने पहले बड़े मानसूनी इम्तिहान से गुजर रहा है। पश्चिमी घाट में लगातार हो रही भारी बारिश के चलते टनल-2 के बाहर मुंबई की ओर जाने वाले मार्ग पर भूस्खलन हो गया, जिससे चट्टानें, मिट्टी और मलबा सड़क पर आ गिरा। इसके बाद महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (MSRDC) ने एहतियात के तौर पर यातायात को अस्थायी रूप से डायवर्ट कर दिया। वहीं, नए बने मार्ग के कुछ हिस्सों पर गड्ढेनुमा सतही क्षति भी सामने आई है, जिसकी तत्काल मरम्मत के निर्देश दिए गए हैं।
करीब 6,695 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस 'मिसिंग लिंक' परियोजना का उद्देश्य दुर्घटना-प्रवण खंडाला घाट मार्ग को बाईपास कर यात्रा को लगभग 30 मिनट कम करना है। इस परियोजना में 8.9 किलोमीटर लंबी ट्विन टनल, 1.68 किलोमीटर की दूसरी सुरंग, केबल-स्टे ब्रिज और कई वायाडक्ट शामिल हैं। हालांकि, यह मार्ग सह्याद्री (पश्चिमी घाट) के उस क्षेत्र से होकर गुजरता है, जहां हर साल 3,000 से 6,000 मिमी तक बारिश होती है और मानसून के दौरान भूस्खलन की घटनाएं आम रहती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह मार्ग डेक्कन ट्रैप बेसाल्ट चट्टानों वाले इलाके से गुजरता है, जहां दरारों वाली चट्टानें, कमजोर मिट्टी और ज्वालामुखीय संरचनाएं ढलानों को पहले से ही अस्थिर बनाती हैं। भारी बारिश के दौरान पानी इन दरारों में भर जाता है, जिससे ढलानों पर दबाव बढ़ता है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। इंजीनियरों का कहना है कि सुरंग के प्रवेश और निकास क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि खुदाई के बाद यहां प्राकृतिक चट्टानी सहारा कम हो जाता है। फिलहाल अधिकारियों का कहना है कि सुरंग की संरचना पूरी तरह सुरक्षित है और भूस्खलन सुरंग के बाहर ढलान पर हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक्सप्रेसवे अपने पहले पूर्ण मानसून की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारी बारिश परियोजना की डिजाइन क्षमता से अधिक थी, ढलानों को सुरक्षित रखने वाली व्यवस्थाएं कितनी प्रभावी साबित हुईं और जल निकासी प्रणाली ने कितनी बेहतर तरीके से काम किया। फिलहाल एमएसआरडीसी सड़क की सतह, ड्रेनेज सिस्टम और ढलानों की विस्तृत जांच करा रही है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।