पुणे न्यूज डेस्क: वीआरएस लेकर नौकरी छोड़ने वाले एक कर्मचारी ने अपने आईटीआर में करीब 65.21 लाख रुपये की रकम को एडवांस सैलरी के तौर पर दिखाया, लेकिन इसी रिपोर्टिंग के तरीके ने उसे इनकम टैक्स विभाग के साथ लंबे विवाद में डाल दिया। मामला 2018-19 का है, जब औरंगाबाद में उसकी कंपनी का मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंद हुआ और कर्मचारियों के लिए एक खास वित्तीय स्कीम लाई गई। कर्मचारी ने इस स्कीम के तहत वीआरएस लिया और उसे कुल 65,21,105 रुपये मिले, जिसमें एक्स-ग्रेशिया/सर्विसेंस पे, अर्ली बिड और ग्रुप पार्टिसिपेशन इंसेंटिव के साथ नोटिस पीरियड का भुगतान शामिल था।
कर्मचारी ने आईटीआर में इस रकम को एडवांस सैलरी बताया और इनकम टैक्स एक्ट की धारा 89 के तहत टैक्स राहत मांगी। विभाग ने उसके दावे को सही नहीं माना और राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद कर्मचारी ने अपनी दलील बदली और कहा कि यह रकम सैलरी थी ही नहीं, बल्कि नौकरी जाने से हुए नुकसान के बदले मिली कैपिटल रिसीट थी, इसलिए इस पर टैक्स नहीं लगना चाहिए। हालांकि, सीआईटी(ए)/एनएफएसी ने रकम को ‘इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज’ माना और धारा 56(2)(xi) के तहत इसे टैक्स के दायरे में रखा।
मामला पुणे इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी आईटीएटी पहुंचा। 8 जून 2026 के अपने फैसले में ट्रिब्यूनल ने कर्मचारी की दलील को स्वीकार करते हुए 65.21 लाख रुपये को नॉन-टैक्सेबल कैपिटल रिसीट माना। कर्मचारी ने बताया था कि उसने किसी जबरन टर्मिनेशन के कारण नहीं, बल्कि कंपनी की खास स्कीम के तहत वीआरएस/रिजाइन किया था। स्कीम में भी साफ लिखा था कि नौकरी खत्म होने को रिजाइन माना जाएगा, रिट्रेंचमेंट या कंपनी की ओर से टर्मिनेशन नहीं। इसलिए ट्रिब्यूनल ने माना कि धारा 56(2)(xi) के तहत टैक्स लगाने की शर्त यहां पूरी नहीं होती।
आईटीएटी ने यह भी ध्यान दिया कि इसी कंपनी के दूसरे कर्मचारियों को इसी स्कीम के तहत मिली रकम से जुड़े मामलों में पहले भी ट्रिब्यूनल के अलग-अलग बेंच ने इसे कैपिटल रिसीट माना था। चार्टर्ड अकाउंटेंट सुरेश सुराणा के मुताबिक, ट्रिब्यूनल ने इसी तरह के मामलों में अपनाए गए फैसलों को देखते हुए ‘कंसिस्टेंसी’ के सिद्धांत को भी लागू किया। आखिरकार पुणे आईटीएटी ने सीआईटी(ए)/एनएफएसी का आदेश पलट दिया और आकलन अधिकारी को असेसमेंट में बदलाव करने का निर्देश दिया। यानी इस मामले में कर्मचारी को राहत इसलिए मिली क्योंकि रकम को नौकरी के टर्मिनेशन से जुड़ा भुगतान नहीं, बल्कि वीआरएस/रिजाइन के तहत मिली कैपिटल रिसीट माना गया।