पुणे न्यूज डेस्क: पुणे में साइबर ठगों ने एक 84 वर्षीय सेवानिवृत्त बुजुर्ग और उनकी पत्नी को चार दिनों तक 'डिजिटल अरेस्ट' का डर दिखाकर ₹50.5 लाख की ठगी कर ली। खुद को एटीएस और सीआईडी अधिकारी बताने वाले ठगों ने दंपती को विश्वास दिलाया कि वे एक आपराधिक मामले की जांच के दायरे में हैं। जब तक बुजुर्ग को यह समझ आया कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है, तब तक वह लाखों रुपये ठगों के खातों में ट्रांसफर कर चुके थे।
पुणे साइबर पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
एफआईआर के अनुसार, 13 जुलाई को पीड़ित को एक अंतरराष्ट्रीय नंबर से व्हाट्सएप वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को लखनऊ में तैनात एटीएस अधिकारी बताते हुए दावा किया कि पीड़ित के आधार कार्ड का इस्तेमाल एक आपराधिक मामले में हुआ है और उनके बैंक खाते में अपराध से जुड़ी रकम आई है। ठगों ने बुजुर्ग और उनकी पत्नी को गिरफ्तारी की धमकी भी दी।
डर का माहौल बनाने के लिए आरोपियों ने दंपती से कहा कि उनके दोनों फोन निगरानी में हैं, इसलिए फोन हमेशा अपने पास रखें और बंद न करें। उन्हें यह भी कहा गया कि यदि कोई उनके घर आए तो तुरंत इसकी जानकारी दें और घर बंद रखें, क्योंकि मामले के अन्य आरोपी उनकी हत्या कर सकते हैं। साथ ही उन्हें किसी से भी इस बारे में बात करने से मना किया गया।
विश्वास दिलाने के लिए ठगों ने व्हाट्सएप पर कथित गिरफ्तारी वारंट, संपत्ति जब्ती आदेश और अन्य सरकारी दस्तावेजों जैसी दिखने वाली तस्वीरें भी भेजीं। इसके बाद उन्होंने दंपती की बैंक जमा, एफडी और अन्य संपत्तियों की जानकारी मांगी। जांच में सहयोग करने के नाम पर बुजुर्ग ने अपने बैंक दस्तावेजों की तस्वीरें भी साझा कर दीं।
इसके बाद ठगों ने उन्हें अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाने, रकम बचत खाते में जमा करने और आरटीजीएस फॉर्म भरने के लिए कहा। 14 जुलाई को पीड़ित ने उनके निर्देश पर ₹50.5 लाख उस खाते में ट्रांसफर कर दिए, जिसे ठगों ने रिजर्व बैंक द्वारा सत्यापन के लिए इस्तेमाल होने वाला खाता बताया था।
शुरुआत में आरोपियों ने कहा कि सत्यापन के बाद 15 जुलाई तक पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। बाद में उन्होंने अतिरिक्त औपचारिकताओं का बहाना बनाकर ₹14.5 लाख और 'बॉन्ड राशि' के रूप में मांगे। इसी दौरान पीड़ित को एहसास हुआ कि वह साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं।
पीड़ित ने सबसे पहले राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई और फिर पुणे साइबर पुलिस से संपर्क किया। पुलिस अब ठगी की रकम के लेनदेन और जिन बैंक खातों में पैसे भेजे गए, उनकी जांच कर रही है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो या आरबीआई का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। इसके बाद ठगी की रकम फर्जी बैंक खातों के जरिए विदेशों में सक्रिय साइबर अपराध नेटवर्क तक पहुंचाई जाती है।